पिछले नौ वर्षों में कामरान ने 50 हज़ार किलोमीटर साइकिल चलाकर 43 देशों की यात्रा की है. आज कल कोविड-19 के कारण पाकिस्तान में रुके हुए हैं और इंतज़ार कर रहे है कि कब उन्हें हरी झंडी मिले और वो अपनी साइकिल के पैडल पर पैर रखें.

बचपन में जब मैं 12 या 13 साल का था, तो मैं एक बार अपने एक दोस्त के साथ साइकिल से 12 रबी-उल-अव्वल (अरबी महीना, इस दिन पैग़ंबर मोहम्मद का जन्म हुआ था और उनकी मृत्यु भी इसी दिन हुई थी) के दिन चौक आज़म गया. यह लेह से 26 किलोमीटर दूर एक छोटी सी जगह है. वहां 12 रबी-उल-अव्वल का एक प्रोग्राम हो रहा था.

इस यात्रा में एक और क्लासमेट भी शामिल हो गए. एक आगे बैठा और एक पीछे और मैं 12 साल की उम्र में दो लड़कों को साइकिल पर बिठा कर निकल पड़ा.

रास्ते में हम नहरों पर रुके, फल तोड़ कर खाये, बहुत मज़ा आया. इस तरह, मेरी पहली साइकिल यात्रा 52 किलो मीटर की थी, जिसमें आना और जाना शामिल था. इससे मुझे एक अजीब सा आनंद आया. और कहते हैं न कि, ‘जैसे पर लग जाते हैं’ मुझे भी ऐसा ही लगा.

उसके बाद मैंने घर वालों से छिप-छिप कर लेह से मुल्तान की यात्रा की, जो कि 150 या 160 किमी दूर था. उसके बाद मैं लेह से लाहौर भी गया जो दो दिन की यात्रा थी. हर एक यात्रा के बाद जब परिवार को पता चलता था तो मार भी पड़ती थी कि मैं पढ़ने के बजाय क्या कर रहा हूं.

उसके बाद मैंने बताना ही बंद कर दिया. वो कहते थे कि आपको अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए, हम आप पर इतना पैसा ख़र्च कर रहे हैं, और आप यह कर रहे हैं. सीधे हो जाओ नहीं तो, फिर दुकान पर ही बिठा देंगे.
जर्मनी की यात्रा
इसके बाद मेरा जर्मनी में कंप्यूटर साइंस में एडमिशन हो गया. हालात तो मुश्किल थे, लेकिन बड़ी मुश्किल से लोगों से पैसे मांग कर इकट्ठा किये और जर्मनी की यात्रा शुरू की.

यह 16 अक्टूबर 2002 की बात है. इस्लामाबाद से फ्रैंकफ़र्ट तक पीआईए की फ्लाइट थी. इस महीने 16 अक्टूबर को इस यात्रा को 18 वर्ष हो जायेंगे. जैसे ही विमान तुर्की के ऊपर से गुज़रा, खिड़की से बाहर देखते हुए, नदी, नाले, सड़क आदि सब कुछ मुझे आड़ी तिरछी लाइनों की तरह दिख रहे थे.

पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे पुराने काग़ज़ों में सिलवटें पड़ी हुई हों. मुझे लगा कि इतना विशाल और सुंदर परिदृश्य है, लोग यहां कैसे रहते होंगे, वे किस बारे में बात करते होंगे, इनकी संस्कृति क्या होगी.

मैं सोचता रहा लेकिन मुझे उस समय इसका जवाब नहीं मिल रहा था. मैंने उस समय सोचा, क्यों न मैं इन रास्तों पर ख़ुद चल कर यह सब देखूं.

विमान अभी तक जर्मनी उतरा भी नहीं था. मैंने वहीं बैठे-बैठे ख़ुद से वादा किया कि एक दिन मैं जर्मनी से पाकिस्तान साइकिल पर जाऊंगा. जर्मनी में उतरने के बाद, अपने सपने को पूरा करने में नौ साल लग गए.

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