ग्वालियर।

रात 1:30 बजे डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर और विजय भदौरिया ड्यूटी पर थे तभी उन्होंने देखा कि सड़क किनारे एक व्यक्ति कचरे में खाना ढूंढ रहा है। दोनों में से एक ने अपने जूते और दूसरे ने ठंड से बचने के लिए उसे अपनी जैकेट दे दी। जब दोनों पुलिस अधिकारी वहां से जाने लगे तो भिखारी से देखने वाले उस युवक ने दोनों को उनके नाम से पुकारा। इसके बाद मनीष मिश्रा ने दोनों अधिकारियों के साथ लंबे समय तक बातचीत की। फिर जैसे ही उसकी लाइफ की कहानी 2005 के पास आई, मनीष मिश्रा फिर से वैसे ही हो गए जैसे 2 घंटे पहले थे।

सन 1999 से लेकर 2005 तक मध्य प्रदेश पुलिस की सेवा करने वाले सब इंस्पेक्टर मनीष मिश्रा पिछले 10 सालों से ग्वालियर की सड़कों पर लावारिस घूम रहे हैं। यहां वह कचरे में लोगों का झूठा खाना मिल जाता है तो खा लेते हैं। खुले आसमान के नीचे जहां जगह मिले रात बिता लेते हैं।
सब इंस्पेक्टर मनीष मिश्रा के परिजनों का कहना है कि उनका मानसिक संतुलन खराब है परंतु 10 नवंबर 2020 मतगणना की रात 1:30 बजे जो कुछ भी हुआ, वह घटनाक्रम यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि ऐसा ही मनीष मिश्रा पागल नहीं है और उनकी याददाश्त भी अच्छी है।
ग्वालियर के झांसी रोड इलाके में सालों से सड़कों पर लावारिस घूम रहे सब इंस्पेक्टर मनीष मिश्रा सन् 1999 पुलिस बैच का अचूक निशानेबाज थानेदार थे। मनीष दोनों अफसरों के साथ 1999 में पुलिस सब इंस्पेक्टर में भर्ती हुआ था। दोनों डीएसपी रत्नेश सिंह तोमर और विजय भदौरिया ने इसके बाद काफी देर तक मनीष मिश्रा से पुराने दिनों की बात की और अपने साथ ले जाने की जिद की जबकि वह साथ जाने को राजी नहीं हुआ। अंततः एक समाज सेवी संस्था के माध्यम से मनीष मिश्रा को आश्रम में भिजवा दिया गया है।
मनीष मिश्रा के परिवार की बात की जाए तो उनके भाई भी टीआई है पिता व चाचा एडिशनल एसपी से रिटायर हुए हैं। चचेरी बहन दूतावास में पदस्थ है और मनीष मिश्रा द्वारा खुद 2005 तक नौकरी की गई है। आखिरी समय तक वह दतिया जिले में पदस्थ रहे इसके बाद मानसिक संतुलन खो बैठे। पत्नी से उनका तलाक हो चुका है जो न्यायिक सेवा में पदस्थ है। लिहाजा इस घटनाक्रम से जितने यह अधिकारी हैरान हुए उतने लोग भी हैरान हो रहे है।
मध्य प्रदेश पुलिस या कोई भी यूनिफॉर्म सर्विस में शासन एक अधिकारी की ट्रेनिंग पर एक बड़ी रकम खर्च करता है। ऑन ड्यूटी अधिकारी और वह भी मनीष मिश्रा जैसा शार्प शूटर अचानक ड्यूटी से ऑफ हो जाए तो डिपार्टमेंट के लिए यह सामान्य बात नहीं होनी चाहिए। क्या पुलिस डिपार्टमेंट में ऐसी कोई पॉलिसी है जिसके तहत यह पता लगाया जाता हो कि बीमार हुआ अधिकारी, यदि लंबे समय तक ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हुआ तो तस्दीक की जाएगी वह स्वस्थ हुआ या नहीं। एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि 2005 में सब इंस्पेक्टर मनीष मिश्रा की लाइफ में ऐसा क्या हुआ था, जिसके कारण वह आज इस हालत में पहुंच गए। इन्वेस्टिगेशन जरूरी है।

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