केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के विभाग ने खिलौना निर्माताओं के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) से प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य कर दिया है। नियमों के मुताबिक, 1 जनवरी 2021 से वही कंपनियां भारत में खिलौनों का निर्माण कर सकेंगी, जिसके पास बीआईएस सर्टिफिकेट होगा। इसमें निर्माता को प्रत्येक खिलौने के लिए एक अलग लाइसेंस की आवश्यकता होती है। यह प्रमाणपत्र परीक्षण के बाद ही जारी किया जाएगा। सरकार के इस नियम ने खिलौना निर्माताओं की बेचैनी बढ़ा दी है।
‘द टॉयज असोसिएशन ऑफ इंडिया’ के प्रेसिडेंट अजय अग्रवाल का कहना है कि देश में खिलौने बनाने वाली 5-6 हजार छोटी बड़ी फैक्ट्रियां हैं। अभी तक करीब सवा सौ निर्माताओं ने लाइसेंस के लिए अप्लाई किया है, जिसमें लगभग 25 मैन्यफैक्चर को लाइसेंस मिला है। सरकार से डिमांड है कि छोटी फैक्ट्रियों को इनहाउस लैब लगाने की अनिवार्यता से छूट मिले। वर्तमान नियमों के मुताबिक इन हाउस लैब लगाने पर ही बीआईएस में अप्लाई किया जा सकता है। निर्माताओं को बाहर की लैब से खिलौना टेस्ट कराने की अनुमति मिले। क्योंकि एक लैब लगाने का शुरुआती खर्च 8 से 10 लाख रुपए है, जिसका सालाना खर्चा करीब 5 लाख रुपए होगा। हर कंपनी के लिए लैब लगा पाना मुमकिन नहीं है। इस संदर्भ में सरकार को पत्र भी लिखा है।
अजय अग्रवाल का कहना है कि वह भी निर्माता हैं, लिहाजा दिक्कत समझ रहे हैं। देश में तमाम छोटे-छोटे कलस्टर में खिलौने बन रहे हैं। इस तरह की अनिवार्यता से देश में खिलौनों का बड़े स्तर पर निर्माण संभव नहीं है। बहुत से छोटे निर्माता जो यह प्रोसेस नहीं अपना सकते, वे दूसरे ट्रेड में जाने का मन बना रहे हैं। खिलौना निर्माता बीआईएस के खिलाफ नहीं हैं। बस इसके खर्चे और प्रोसेस काफी ज्यादा हैं। सरकार के पास भी इतने साधन नहीं है कि जनवरी से पहले हजारों निर्माताओं को लाइसेंस जारी कर दे। बच्चों को सुरक्षित खिलौना मुहैया कराना निर्माताओं की प्राथमिकता है। अभी मार्केट में कई तरह की मशीनें पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हैं। जल्दबाजी में महंगे दामों पर मशीन और लैब संबंधी उपकरण मिल रहे हैं।
टॉयज मैन्यूफैक्चरर शरद कपूर का कहना है कि देश में ज्यादातर खिलौने बनाने वाले अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर में हैं। इस इंडस्ट्री में छोटे निर्माताओं का हिस्सा 95 प्रतिशत है। ऐसे में हर कोई बीआईएस सर्टिफिकेट के लिए लैब नहीं लगा सकता है। सरकार से अनुरोध है कि छोटे निर्माताओं को राहत दे। सेफ टॉय के सपोर्ट में मैन्यफैक्चर्स भी हैं। अगर, सरकार इन्हें दूसरी जगह किसी लैब में टेस्टिंग की अनुमति दे दे, तो काफी सहूलियत होगी।

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